“पार्क में लिया वो फैसला, जिसे मैं कभी नहीं भूलूँगी।”

इन तीन दिनों में मैंने लोगों का वो पागलपन देखा, जो शायद आँकड़ों में नहीं आता, रिपोर्टों में नहीं दिखता – बस यादों में रह जाता है । 2025 के महाकुंभ स्नान के लिए, मैंने लोगों को अपनी जान दाँव पर लगाते देखा । अपनों की परवाह किए बिना, नतीजों की चिंता किए बिना – बस एक ही ज़िद… प्रयागराज जाना है । और सच कहूँ, उस ज़िद का थोड़ा हिस्सा मेरे भीतर भी था ।


और सच कहूँ, उस ज़िद का थोड़ा हिस्सा मेरे भीतर भी था । कई दिनों से मन में एक मलाल बैठा हुआ था । इतने सालों बाद महाकुंभ आया है । देश के हर कोने से लोग निकल पड़े है । मेरे घर वाले भी जाकर लौट आए है… और मैं अब तक नहीं जा पाई थी । प्लान बन ही नहीं पा रहा था। तत्काल टिकट ऐसे मिल रहा था जैसे किस्मत की लॉटरी हो । 15 फ़रवरी की शाम, पार्क में बैठे-बैठे मैंने अपने एक दोस्त से कुम्भ नहाने न जा पाने का दुःख साझा किया । यह सुनकर उसने मुझे भरोसा दिलाया कि वह मुझे कुम्भ नहाने ज़रूर ले जाएगा । और उसी शाम हम घरवालों से इजाज़त लेकर प्रयागराज के लिए निकल पड़े ।

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और वो रात

रात करीब 9 बजे हम नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचे। मेट्रो से बाहर निकलते ही जो हमने देखा, वो सिर्फ भीड़ नहीं थी – अंधी भीड़ थी । स्टेशन की ओर जाने वाला हर रास्ता लोगों, गाड़ियों और शोर से भरा हुआ था । हवा में एक अजीब-सी बेचैनी थी – जैसे हर कोई भाग रहा हो, लेकिन किसी को नहीं पता हो कि किस दिशा में जाना है । किसी तरह हम रेलवे स्टेशन के मेन एंट्री गेट तक पहुँचे । वहाँ पुलिस लगातार लोगों को समझा रही थी –  “जान जोखिम में मत डालिए। अंदर बहुत भीड़ है ।” पता नहीं कैसे, लेकिन पुलिस वालों को भीड़ में देखकर ही पता चल जाता है कि किसके पास टिकट है और किसके पास नहीं । तभी भीड़ के बीच से एक आवाज़ आई – “अब जो हो जाए… प्रयागराज तो जाकर रहेंगे ।” उस आवाज़ ने मुझे जैसे जकड़ लिया । कुछ देर तक वही बात मेरे कानों में लगातार गूंजती रही । डर मुझे भी लग रहा था… लेकिन शायद उस आवाज़ में मेरी अपनी ज़िद भी छुपी थी ।

प्लेटफॉर्म और पहली भगदड़

किसी तरह प्लेटफॉर्म तक पहुँचे । बाहर के मुकाबले यहाँ भीड़ थोड़ी कम लगी तो मैंने राहत की साँस ली । लेकिन ये राहत कुछ ही मिनटों की थी । जैसे ही आने वाली ट्रेन की घोषणा हुई – भगदड़ मच गई । लोग धक्का दे रहे थे, चिल्ला रहे थे । हर कोई आगे बढ़ना चाहता था । तब किसी को भी किसी के उम्र, लिंग और तकलीफ का लिहाज़ नहीं था । मेरा दोस्त मुझे प्लेटफॉर्म के एक कोने में बनी सीमेंट की बेंच के पास ले गया । तभी मुझे अचानक तेज़ ठंड का एहसास हुआ । दो स्वेटर, एक मोटा जैकेट… फिर भी ठंड सिर पकड़ रही थी । छींकें लगातार आ रही थीं । तभी याद आया कि घर से निकलते समय बैग में विक्स रखी थी । मैंने वहीं बेंच पर बैठकर सिर में विक्स लगा लिया । मुझे लग रहा था बुखार चढ़ रहा है । लेकिन मैंने अपने दोस्त को कुछ नहीं बताया – उसकी चिंता नहीं बढ़ाना चाहती थी । लेकिन जैसे ही उसने मुझे विक्स लगाते देखा, उसने तुरंत कहा – “चलो, घर चलते हैं ।”
लेकिन शायद मेरा प्रयागराज जाना पहले से तय था… और वो भी इसी हालत में ।

दो अजनबी और एक अजीब रास्ता

हमारे साथ उसी बेंच पर दो और लोग बैठे थे । उम्र में मेरे पापा जितने । कपड़े से सिक्योरिटी गार्ड लग रहे थे ।थोड़ी देर बाद उन्होंने मेरे दोस्त से पूछा – “आप भी प्रयागराज जा रहे हैं?” मेरे दोस्त ने जवाब दिया, “जी अंकल ।” इसके कुछ देर बाद जो हुआ, वो जब आज भी याद करती हूँ तो ऐसा लगता है जैसे वो कोई पहले से की गयी प्लानिंग का हिस्सा था । हमारे प्लेटफॉर्म से थोड़ी देर पहले एक ट्रेन जा चुकी थी । दूसरी ट्रेन आए मुश्किल से दो मिनट हुए थे कि अंकल अचानक बोले – “हमारे साथ चलो ।” वो आगे, फिर मेरा दोस्त और सबसे पीछे मैं । हम ट्रेन में चढ़े, दूसरी तरफ पटरी पर उतरे, तीन खाली पटरियाँ पार कीं और दूसरे प्लेटफॉर्म पर पहुँच गए । वहाँ भी लोग इंतज़ार में खड़े थे । ट्रेन 11 बजे आनी थी । हम जिस प्लेटफॉर्म पर थे, वहाँ हमारे आने से कुछ देर पहले भगदड़ मची थी । उसमें कई लोग घायल हुए थे और सुनने में आया कि कुछ लोगों की जान भी चली गई । उसी घटना की जांच करने न्यूज़ चैनल वाले वहाँ आ गए थे । जब भी कैमरा हमारी तरफ घूमता, मैं अपना चेहरा शॉल में छुपा लेती थी । उस पल मुझे अचानक गदर फिल्म का स्टेशन वाला दृश्य याद आने लगा ।

खाली ट्रेन, और बेबाक रो पड़ना

वक़्त धीरे-धीरे बीत रहा था । तभी पास की पटरी पर एक खाली ट्रेन आकर लगी – और फिर से भगदड़ मच गई । अंकल के इशारे पर हम दो पटरियाँ पार कर उसी ट्रेन में चढ़ गए । किस्मत से मुझे खिड़की वाली सीट मिल गई । सीट पर बैठते ही मैं फूट-फूटकर रो पड़ी । बिना किसी की परवाह किए । घर के सारे लोग एक-एक करके याद आने लगे थे । रोते-रोते साँस फूलने लगी थी । उस समय मेरे दोस्त ने मुझे बहुत संभाला । तभी घर से वीडियो कॉल आया । मम्मी का चेहरा देखा । उनसे बात की । तब जाकर थोड़ा मन शांत हुआ । जब मैंने आस-पास देखा तो समझ आया – हम तो बैठ गए थे, लेकिन कितने लोग अब भी दरवाज़े तक खड़े थे । महिलाएँ गोद में बच्चों को लेकर जगह बनाने की कोशिश कर रही थीं । बच्चे रो रहे थे । कुछ देर बाद ट्रेन चल पड़ी । मुझे एक मैसेज मिला । मेरे ऑफिस के एक सहकर्मी ने थोड़ी देर पहले आया न्यूज़, स्टेशन पर हुई भगदड़ की खबर मुझे भेजी थी । मैंने वह खबर देखी और उन्हें जवाब में लिखा कि मैं अभी ट्रेन में हूँ और प्रयागराज जा रही हूँ । इतना पढ़ते ही उन्होंने मैसेज में ही अपना गुस्सा जताना शुरू कर दिया । तब मैंने उन्हें बस इतना लिखा – “मैं ठीक हूँ, और मुझे सीट भी मिल गई है ।” थोड़ी देर बाद, मेरे दोस्त ने कहा – “मूवी देख लो ।” नींद तो वैसे भी आने वाली नहीं थी । इसलिए मैंने पूरी रात कभी मूवी देखते हुए, तो कभी आस-पास के लोगों को देखते हुए ही काट दी ।

लापता ट्रेन

सुबह सबको उम्मीद थी कि दोपहर तक प्रयागराज पहुँच जाएँगे । लेकिन दोपहर निकल गई । फिर 3 बज गए । जब लोगों ने ट्रेन के बारे में पूछताछ की तो पता चला – न ट्रेन का नाम मिल रहा था, न नंबर। लोग स्टेशन-स्टेशन उतरकर ट्रेन के डिब्बों को देखने लगे कि शायद कहीं कोई जानकारी मिल जाए । आख़िरकार किसी से पता चला कि भीड़ को देखते हुए यह ट्रेन अचानक दिल्ली से प्रयागराज के लिए चलाई गई थी । इतना सुनकर कम से कम यह चिंता खत्म हो गई कि ट्रेन कहीं और नहीं जा रही । रात 11 बजे ट्रेन प्रयागराज से एक स्टेशन पहले रुक गई । यही आखिरी स्टॉप था । पूरे 24 घंटे बाद हम ट्रेन से उतरे । न टॉयलेट। न खाना । कम से कम हमारे पास सीट तो थी ।

24 घंटे की थकान, और एक नई सुबह

रात में कमरा ढूँढना भी एक परीक्षा थी । डेढ़ घंटे भटकने के बाद हमें एक कमरा मिला । बुखार अब साफ महसूस हो रहा था । खाने के बारे में पूछा तो मकान मालिक ने कमरे में ही खाना भिजवा दिया । दवाई ली और सो गई । सुबह जल्दी उठे और कुंभ स्नान के लिए निकल पड़े । रास्ते में चाय पी । जलेबी-राबड़ी खाई । और फिर आगे बढ़ गए । जहाँ रिक्शा ने छोड़ा वहाँ कोई दुकान नहीं थी । बस खुला आसमान, साफ ज़मीन और दूर-दूर तक टेंट । इतनी अराजकता के बाद उस जगह पर खड़े होकर मेरे भीतर एक अजीब-सी शांति थी । जैसे कहानी को यहीं थोड़ी देर रुकना था ।

भीड़ जो खुद रास्ता बनाती है

आगे मिट्टी की सड़क थी । कई चौराहे आए जहाँ हमें रुककर रास्ता चुनना पड़ता । धीरे-धीरे भीड़ बढ़ती गई । करीब डेढ़ घंटे बाद हम एक ऐसी जगह पहुँचे जहाँ जबरदस्त भीड़ थी । वहाँ एक पुराना शिव मंदिर था और जल चढ़ाने वालों की लंबी कतार । रविवार का दिन था । पुलिस जगह-जगह छोटे-छोटे समूहों में तैनात थी । उन्होंने श्रद्धालुओं को आगे जाने से मना कर दिया । वहाँ मौजूद सभी श्रद्धालुओं को बीच से रास्ता खाली करने को कहा गया । इन्ही सब के बीच लोग पुलिस वालों से विनती कर रहे थे, उन्हें बता रहे थे कि वे कितनी दूर से कुंभ नहाने के लिए आए हैं, उन्हें आगे जाने दिया जाए । करीब दो घंटे तक यही सिलसिला चलता रहा – मनाने का, समझाने का । फिर अचानक पुलिस ने जाने की अनुमति दे दी । इतना सुनते ही भीड़ फिर से संगम की ओर चल पड़ी ।

वो पत्थरों की दीवार

हम बहुत देर से चल रहे थे । हर थोड़ी देर में लगता – बस संगम आ गया । लेकिन रास्ता खत्म ही नहीं हो रहा था । एक जगह रास्ता इतना संकरा हो गया कि घरों के बीच से गुजरना पड़ रहा था । तभी एक स्थानीय आदमी ने कहा – “इस गली से जाओ, जल्दी पहुँच जाओगे ।” हम उसी रास्ते पर मुड़ गए । कुछ देर बाद गली खत्म हुई और दूर से संगम दिखाई देने लगा । हम ऊपर सड़क पर थे और संगम नीचे । दृश्य बेहद सुंदर था । लेकिन संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ था । आगे पुलिस ने फिर रास्ता बंद कर रखा था । लोग आगे नहीं जा पा रहे थे, जिससे भीड़ और बढ़ गई और विरोध भी होने लगा । पर लोग कहाँ मानने वाले थे । वे सड़क से नीचे उतरकर संगम की मिट्टी पर चलने लगे और आगे बढ़ने लगे । हम भी लोगों को देखकर नीचे उतर आए और उसी रास्ते पर चलने लगे । इसके बाद जो हमने देखा और किया, उसे मैं शायद कभी नहीं भूल पाऊँगी । वैसे तो यह पूरा सफ़र ही अविस्मरणीय था ।  आगे पत्थरों से बनी एक दीवार थी, जिन्हें तारों से बाँधा गया था । लोग उसी पर चढ़कर ऊपर जा रहे थे । मेरे दोस्त ने पूछा – “तुम चढ़ पाओगी?” मैं पूरे भरोसे से जवाब नहीं दे पाई । मैं आगे थी और मेरा दोस्त बैग लेकर मेरे पीछे । हम उन पत्थरों पर चढ़ने लगे । और बस 4 से 5 मिनट में ही हम सड़क तक पहुँच गए । अब हम त्रिवेणी के बहुत पास थे ।


त्रिवेणी का अनुभव

बस कुछ ही देर बाद वो एक पल आया जब मैंने महसूस किया की हम एक दुनियां के बीचों-बीच खड़े है । जहां हर उम्र के लोग थे । हर चेहरे पर अलग कहानी थी । जो लोगों की भीड़ यहाँ थी वो और कही से कई ज्यादा थी लेकिन फिर भी वो भीड़ जैसा मुझे महसूस ही नहीं हुआ । त्रिवेणी में नहाते लोग, कोई कपड़ा बदल रहा था तो कोई किसी के लिए कपड़े लिए खड़ा था तो कोई कपड़े पानी से खंगाल रहा था । जिस पावन धरती पर मैं खड़ी थी वह पूरी तरह से कपड़े से ढकी हुयी थी । खैर, इसका एहसास मुझे बहुत देर बाद हुआ । मेरे दोस्त ने बताया की यहाँ भी लोगों की भगदर मची थी और ये अधिकतर कपड़ें उन्ही लोगों के है । वहां ठीक से खड़े होने की भी जगह नहीं थी इसलिए मैंने अपने दोस्त के कहाँ की वो जाकर नहा आये ताकि कोई एक सामान संभाल सके । और फिर हम दोनों बारी-बारी से त्रिवेणी में नाहा आये । लेकिन जिस श्रद्धा से हम गए थे उतना ही हमें दुःख हुआ त्रिवेणी के पानी को देखकर । पानी इतना ज्यादा गन्दा था की मुझे किनारे से बहुत दूर जाकर नहाना पड़ा । वो बात अलग थी कि वहाँ भी साफ़ पानी नहीं मिला, लेकिन मन को संतुष्टि ज़रूर मिली ।

वापसी की थकान

अब हमें वापस निकलना था । त्रिवेणी से बाहर आते हुए मेरे भीतर एक अजीब-सी शांति थी, लेकिन शरीर पूरी तरह थक चुका था । थोड़ा आगे बढ़े तो दूर से बड़े वाले हनुमान जी का मंदिर दिखाई दिया । भीड़ वहाँ भी उतनी ही थी । लोग लंबी कतारों में लगे हुए थे । उस समय सच कहूँ तो भीड़ में खड़े होने की हिम्मत ही नहीं बची थी । इसलिए फिर हम वापस सड़क की तरफ चल पड़े । बस चलते ही रहे । कभी लगता अब रास्ता खत्म हो जाएगा… लेकिन कुछ दूर जाकर फिर वही भीड़, वही लोग, वही धूल भरी सड़क । ऑटो या रिक्शा मिलने की उम्मीद हम बीच-बीच में करते रहे, लेकिन सड़क इतनी भरी हुई थी कि किसी गाड़ी का निकल पाना भी मुश्किल था । काफी देर चलने के बाद सड़क के किनारे कई ठेले एक लाइन में दिखाई दिए । लोग वहीं खड़े-खड़े खाना खा रहे थे । हम भी एक ठेले के पास रुक गए । उस समय भूख इतनी थी कि साधारण-सा खाना भी बहुत अच्छा लग रहा था । खाना खाकर हमने फिर चलना शुरू किया । अब पैर पहले से धीमे उठ रहे थे । मेरे दोस्त ने भी अपनी चाल धीमी कर ली थी ताकि मैं आराम से चल सकूँ ।

बीच रास्ते का ठहराव

धीरे-धीरे हम अपने इस यात्रा के बारे में बात करते-करते काफी आगे निकल आए थे कि अचानक एक बड़े स्कूल के सामने पुलिस ने हमें रोक लिया । उनका कहना था की आगे बहुत भीड़ है । हमने उनसे पूछा की हमें कितनी देर यहाँ रुकना होगा तो उन्होंने 20 मिनट बताया । हमने सोचा ठीक है, थोड़ा आराम भी मिल जाएगा । काफी देर से चल ही रहे थे । लेकिन वो 20 मिनट… धीरे-धीरे 1 घंटे से ऊपर हो गया । क्योंकि आगे लोगों को जाने से रोका जा रहा था, पीछे से आने वाली भीड़ भी वहीं जमा होने लगी । स्कूल का मैदान बड़ा था, इसलिए लोग जगह ढूँढकर बैठने लगे । किसी ने जमीन पर चादर बिछा ली । किसी ने बैग को ही तकिया बना लिया । कुछ महिलाएँ अपने गीले कपड़े सुखाने लगी थीं । बच्चे थोड़ी देर बाद वहीं खेलने लगे । तभी मेरे दोस्त ने हँसते हुए मुझे एक बच्चे की तरफ देखने को कहा । वो बच्चा अपने पिता को चिढ़ा रहा था । मैंने एक बार उस बच्चे की तरफ देखा, फिर कुछ देर तक अपने दोस्त के चेहरे को ही देखती रही । इस पूरे सफ़र में पहली बार मैंने उसे यूँ खुलकर हँसते हुए देखा था । एक पल को लगता था जैसे हम किसी मेले में बैठे हैं…और अगले ही पल लगता था जैसे कहीं फँस गए हैं ।

एक मैसेज और थोड़ी उम्मीद

मेरा फोन अब तक बंद हो चुका था । बैटरी खत्म हो गई थी । मेरे दोस्त के फोन में भी मुश्किल से 40% बैटरी बची थी । मेरे पास सिर्फ आज का ही दिन था । कल मुझे ऑफिस पहुँचना था । लेकिन उस हालत में यह सोचना कि मैं कल ऑफिस पहुँच जाऊँगी… मुझे खुद ही भरोसा नहीं हो रहा था । मैंने दोस्त के फोन में अपना इंस्टाग्राम लॉगिन किया और ऑफिस के एक सहकर्मी को मैसेज लिखा कि शायद मैं कल ऑफिस जॉइन नहीं कर पाऊँगी । उनका जवाब आया तो समझ आया कि वो सब मेरे लिए कितना परेशान थे । उन्होंने पूछा – “अभी तुम हो कहाँ?” मैंने उन्हें सब बता दिया – कि हमें एक स्कूल में रोक दिया गया है और हमारे साथ बहुत सारे लोग यहाँ फँसे हुए हैं ।क्योंकि वो प्रयागराज के ही थे, उन्होंने तुरंत अपने एक दोस्त का नंबर दिया और कहा – “इनसे बात करो, अपना लोकेशन दे दो । ये तुम्हें वहाँ से निकाल लेंगे ।” हमने उनसे बात की । लेकिन उससे पहले ही पुलिस ने गेट धीरे-धीरे खोलना शुरू कर दिया और लोगों को आगे जाने देने लगी । कुछ ही देर में हम भी बाहर निकल आए । लेकिन सच कहूँ तो उस पूरे समय के बाद मेरे अंदर थोड़ा डर बैठ गया था । स्कूल के अंदर रहते हुए कई बार ऐसा लग रहा था जैसे हम कहीं कैद हो गए हों । हालाँकि वहाँ एक चीज़ मुझे बहुत अच्छी भी लगी – लोग बहुत सहज थे । जमीन पर लेट जाना, कपड़े सुखाना, बच्चों का खेलना… जैसे लोग हर परिस्थिति को कुछ ही देर में अपना लेते हैं ।

अजनबी शहर में एक अपना

हम बाहर निकल चुके थे । मेरे दोस्त को लगा कि अब उस भाई को बुलाने की जरूरत नहीं है । हम खुद ही स्टेशन की तरफ निकल जाएंगे । लेकिन जब मैंने अपने सहकर्मी को यह बताया, तो उन्होंने साफ मना कर दिया । उन्होंने मेरे दोस्त को भी डाँटा । उनकी आवाज़ में चिंता साफ महसूस हो रही थी । और सच कहूँ तो उनकी बात सुनकर मुझे भी लगा कि शायद इंतज़ार करना ही ठीक होगा । हम वहीं रुक गए । थोड़ी देर बाद वो भाई बाइक से आ गए । उन्हें देखते ही मन का डर जैसे आधा खत्म हो गया । शायद इसलिए भी कि वो वहीं के स्थानीय थे । और जब किसी अनजान जगह पर कोई अपना-सा मिल जाता है, तो रास्ता थोड़ा आसान लगने लगता है । वो हमें अपने साथ एक ढाबे पर ले गए । वहाँ बैठकर हमने आराम से खाना खाया । खाने के बाद उन्होंने हमें बस स्टैंड छोड़ दिया और खुद हमारे साथ खड़े होकर दिल्ली जाने वाली बस ढूँढने लगे । बसें मिल तो रही थीं, लेकिन ज़्यादातर AC वाली बसें थीं और किराया बहुत ज्यादा था । उन्होंने हमें कहा भी कि अगर जरूरत हो तो वो किराया दे देंगे । लेकिन हमारा मन नहीं माना । पहले ही बहुत देर हो चुकी थी । हमने उनसे कहा कि वो घर चले जाएँ । लेकिन वो तब तक नहीं गए जब तक हमें बस नहीं मिल गई ।थोड़ी देर बाद हमें आगरा जाने वाली एक बस मिल गई । हमने उन्हें धन्यवाद कहा… और बस में बैठ गए । अगली सुबह करीब पाँच बजे बस ने हमें आगरा उतार दिया । वहाँ थोड़ा फ्रेश होकर हम दिल्ली के लिए वापस बस से निकल पड़े । सफ़र खत्म हो रहा था, लेकिन दिमाग अब भी उन तीन दिनों में ही अटका हुआ था ।


सीख और अंत

इन तीन दिनों में मैंने बहुत कुछ देखा । लोगों की आस्था… उनकी ज़िद… उनका धैर्य… और कभी-कभी उनका पागलपन भी ।इतनी बड़ी भीड़ को संभालना कितना मुश्किल काम होता होगा, इसका अंदाज़ा मुझे उस सफ़र में कई बार हुआ । कई जगह पुलिस और प्रशासन के लोग लगातार लोगों को समझाते, संभालते और रास्ता बताते दिखाई दे रहे थे । अब जब मैं उस पूरे सफ़र को याद करती हूँ, तो समझ आता है कि जगह-जगह यात्रियों को रोकने की वजह क्या रही होगी । उस समय भले ही हमें वह सब थोड़ा गलत या परेशान करने वाला लग रहा था, लेकिन बाद में महसूस हुआ कि भीड़ को नियंत्रित रखने के लिए ऐसा करना ज़रूरी था, ताकि किसी बड़ी दुर्घटना की संभावना ही न बने । भीड़ बहुत ज़्यादा थी, लेकिन फिर भी उसे व्यवस्थित रखने की कोशिशें जगह-जगह साफ़ दिखाई दे रही थीं । प्रयागराज की उस यात्रा ने मुझे थका दिया था, थोड़ा डरा भी दिया था – लेकिन साथ ही बहुत कुछ सिखा भी दिया । अब जब पीछे मुड़कर सोचती हूँ तो लगता है – यह सिर्फ एक यात्रा नहीं थी । यह उन लाखों लोगों की कहानी थी, जो हर मुश्किल, हर भीड़ और हर डर के बीच बस एक ही विश्वास लेकर घरों से निकले थे – किसी भी तरह प्रयागराज पहुँचना है । और शायद यही विश्वास इस पूरे सफ़र को यादगार बना गया ।

कुछ कहानियाँ पढ़कर नहीं, जीकर समझ आती हैं

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Ankahi Awaaz – क्योंकि जो अनकहा रह जाता है, वही सबसे ज़्यादा गूंजता है…

 

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